सुनामी और भूकंप से निपटने के लिए सबसे बड़ी मॉक ड्रिल, कितना तैयार है भारत ?

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चेतावनी जारी होने के बाद लगभग 40,000 लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए विशेष तैयानेरियां की जा रही हैं। इंडोनेशियाई इलाके से पैदा हुई किसी सुनामी को भारतीय तटों तक पहुंचने में आमतौर पर तीन घंटे लगते हैं, सौ, लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए पर्याप्त समय मिल सकता है। यह ड्रिल 15 घंटे से भी ज़्यादा चलने की संभावना है।

गुरुवार को ईरान और पाकिस्तान के दक्षिण में मकरान ट्रेंच में 9 तीव्रता वाला भूकंप पैदा किया जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप पैदा होने वाली सुनामी की चपेट में भारत का पश्चिमी तट आएगा, जिसमें मुंबई भी शामिल होगी।

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सुनामी वार्निंग नेटवर्क की स्थापना वर्ष 2004 में की गई थी, जब एक भयावह सुनामी की वजह से हिन्द महासागर के इलाके में तीन लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी। वह सुनामी इंडोनेशिया में 9.3 तीव्रता वाला भूकंप आने से पैदा हुई थी।

भारत ने अपना सुनामी वार्निंग सेंटर वर्ष 2007 में स्थापित किया था, जिसमें 85 करोड़ रुपये की लागत आई थी। यह सेंटर चेतावनी जारी करने के लिए नेटवर्क से जुड़े उपग्रहों तथा गहरे समुद्र में लगाए गए तैरने वाले चिह्नों का इस्तेमाल करता है. पाकिस्ता को भी भारत ही सुनामी की पूर्व चेतावनी दिया करता है।

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वर्ष 2007 से अब तक सुनामी वार्निंग सेंटर ने वास्तविक सुनामी की आठ चेतावनियां जारी की हैं, और उसके निदेशक एससी शेनॉय का कहना है, “आज तक कभी कोई गलत चेतावनी जारी नहीं की गई…” यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि पैसिफिक सुनामी वार्निंग सेंटर से अब तक कई बार गलत चेतावनियां जारी हुई हैं, जिससे इस व्यवस्था में लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है।

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एससी शेनॉय ने बताया कि भारत के कलपक्कम, कुडनकुलम और तारापुर स्थित परमाणु संयंत्र, जिन पर सुनामी का असर पड़ सकता है, इस मॉक ड्रिल में भाग नहीं लेगे।

वर्ष 2011 में जापान के फुकुशिमा में हुआ नाभिकीय हादसा एक सुनामी के परमाणु संयंत्र से टकराने की वजह से ही हुआ था, और उसके बाद से ही समुद्रतटीय इलाकों में बने आणविक संयंत्रों को लेकर विश्वभर में चिंता व्याप्त रहती है।

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