इन कमांडो के आगे आतंकवादियों की खेर नहीं

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सेना

पिछले 3 साल में करीब 2000 कमांडोज़ को ट्रेनिंग दी जा चुकी है। अगर किसी बिल्डिंग पर आत्मघाती हमला हो जाता है तो उसे उन हमलावरों के कब्जे से कैसे निकालना है, खड़ी पहाड़ी चढ़ना, नदी पार करना, ये सब इन कमांडोज़ को इस ट्रेनिंग के दौरान सिखाया जाता है। ये लोग हथियारों से लैस होते हैं और आपराधिक जांच के दौरान वैज्ञानिक रक्षा साधनों का इस्तेमाल करना और संबंधित इलाके से सूचना इक्ट्ठा करना भी इन्हें सिखाया जाता है।

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एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक, ‘1999 में करगिल युद्ध में मिली हार के बाद पाकिस्तानी सेना और ISI ने अपनी स्ट्रैटिजी बदल ली है। अब ये लोग कम से कम साधनों का इस्तेमाल कर भारतीय सुरक्षा बल को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं।’ जम्मू कश्मीर में 1999 से 2002 के बीच आत्मघाती हमले सामान्य सी बात थी। अकेले 2001 में करीब दर्जन भर हमले हुए। लेकिन साल 2006 से 2013 के बीच इन हमलों में कमी देखने को मिली। लेकिन 2013 के बाद से एक बार फिर आत्मघाती हमले बढ़ गए हैं। इन हमलों में कश्मीर की सरकारी इमारतों और सुरक्षा संस्थानों को निशाना बनाया जाता है।

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इसी साल 20 फरवरी को जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में आत्मघाती हमला हुआ था जिसमें 9 लोग शहीद हो गए थे। इनमें सेना के 3 विशिष्ट कमांडो और 2 पारामिलिट्री के जवान शामिल थे।

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