दिल्ली:
एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया अधिकार निकाय के अनुसार भारत में भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने में लगे भारतीय मीडियाकर्मी ‘‘गंभीर खतरों’’ का सामना करते हैं। इसके साथ ही निकाय ने दावा किया है कि उसने 1992 से पत्रकारों की हत्याओं के 27 मामलों का अध्ययन किया और उनमें एक में भी किसी को सजा नहीं हुयी है।
दि कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में प्रेस के खिलाफ हिंसा में दंड से छूट के मुद्दे पर संसदीय सुनवाई तथा खामियों एवं चुनौतियों पर काबू के तरीकों की पहचान किए जाने की सिफारिश की है।
न्यूयार्क स्थित सीपीजे ने अपनी रिपोर्ट में जिक्र किया है कि 1992 से पत्रकारों की कार्य से संबंधित हत्या के 27 मामलों में किसी को सजा नहीं मिली है।
इसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार और राजनीति दो ‘‘सबसे खतरनाक बीट’’ हैं।
सीपीजे ने कहा कि पिछले 10 साल में उसे सिर्फ एक मामला मिला जिसमें एक पत्रकार की हत्या के मामले में एक संदिग्ध का अभियोजन हुआ और दोषसिद्धि हुयी। लेकिन बाद में उसे अपील पर रिहा कर दिया गया।
इसमें यह भी कहा गया है कि दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में रिपोटिर्ंग करने वालों पर हिंसा और धमकियों का ज्यादा जोखिम होता है।
इसमें खेद जताया गया है कि किसी पत्रकार पर हमला होने या हत्या होने पर मीडिया क्षेत्र और समाज में अकसर बहुत रोष नहीं जताया जाता।
समिति ने अपने नतीजों पर पहुंचने तथा सुझाव के लिए तीन पत्रकारों जागेंद्र सिंह, उमेश राजपूत और अक्षय सिंह की मौतों के मामलों का अध्ययन किया। जागेंद्र सिंह की उत्तर प्रदेश में हत्या कर दी गयी थी जबकि उमेश राजपूत की छत्तीसगढ़ में हत्या कर दी गयी थी वहीं अक्षय सिंह की मौत मध्य प्रदेश में हुयी थी।
रिपोर्ट में वकालत की गयी है कि संसद पत्रकारों के लिए एक देशव्यापी सुरक्षा कानून बनाए।