‘शहीद दिवस’ पर विशेष: महात्मा गांधी की आखिरी जनवरी

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अकसर कई लोग विपरीत परिस्थितियों में एक जुमले का प्रयोग करते है जो इस तरह से है कि “मजबूरी का नाम महात्मा गांधी”। गांधी जी और मजबूरी को एक साथ रखने वाले अज्ञानी लोग यह भूल जाते हैं कि महात्मा गांधी अगर मजबूर होते तो आज देश शायद आजाद न होता।

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अगर गांधी जी मजबूरी का प्रतीक होते तो वह नमक कानून को तोड़ने के लिए सरकार के आदेश को तोड़ने का दुस्साहस ना करते। अन्याय और भेदभाव के विरुद्ध तन कर खड़ा होने वाला यह निर्णायक क्षण ही महात्मा गांधी को गांधी बनाता है और किसी भी अन्याय/अत्याचार का प्रतिकार करने वाले अदम्य साहस और आत्मबल का पता देता है।

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