साइकल पर सस्पेंस बरकरार : चुनाव आयोग के सामने दोनों पक्षों ने रखे तर्क, फ्रीज हो सकती है साइकल

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सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव की टीम ने सबसे पहले यह तर्क पेश किया कि पार्टी में दो फाड़ हैं या नहीं? अगर दो फाड़ हैं तो इनके हलफनामे में इसका जिक्र क्यों नहीं है? इसके अलावा उन्होंने यह भी तर्क रखा कि सपा ने महासचिव प्रफेसर रामगोपाल को पहले ही पार्टी से बाहर कर दिया था। इसका बाकायदा आधिकारिक पत्र भी जारी किया गया था। इसके बाद पार्टी में उनकी वापसी नहीं हुई है और न ही उसका कोई लिखित आदेश भी जारी हुआ है। इस वजह से महासचिव को कोई भी अधिवेशन बुलाने का संवैधानिक अधिकार नहीं है। अधिवेशन बुलाने का कोई भी अधिकार केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष को है।

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इसके लिए उन्होंने सपा का संविधान भी सामने रखा। यह संविधान पहले से ही आयोग को दिया जा चुका है। इसके अलावा उन्होंने यह भी तर्क रखा कि पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यकाल तीन साल का होता है। 2014 में सपा मुखिया को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था। अभी तीन साल पूरे होने में समय है। फिर बीच में यह चुनाव क्यों? इसके कारण भी नहीं बताए गए?

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टीम अखिलेश के सामने चुनौती है कि उनके लिए समाजवादी पार्टी में दो फाड़ साबित करना मुश्किल होगा। साथ ही अधिवेशन की संवैधानिकता को लेकर उठे सवालों के जवाब भी टीम अखिलेश के लिए चुनौती खड़ी करेंगे। वहीं मुलायम गुट के लिए 4500 से ज्यादा प्रतिनिधियों के हलफनामों का बहुमत नकारना मुश्किल होगा। मुलायम ने संगठन में जो एकतरफा फैसले लिए हैं वह भी मुश्किलें खड़ी करेंगे। सीएम अखिलेश यादव की शुक्रवार को निगाहें दिन भर आयोग के फैसले पर टिकी रही।

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सीएम और उनकी टीम आयोग में हो रही घटनाओं की पल-पल जानकारी फोन और टीवी से लेते रहे। इस दौरान सीएम ने अपने वकीलों और प्रो.रामगोपाल से भी कई बार बात की। कहा जा रहा है कि टीम अखिलेश को अंदाजा था कि शुक्रवार को कोई फैसला आ जाएगा, पर कोई फैसला नहीं आ सका। इससे अब पूरी टीम असमंजस में है।

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