बिहार के बच्चों पर मंडरा रहा है निमोनिया और डायरिया का खतरा, बड़ी बड़ी योजनाएं भी फेल

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स्वास्थ्य मामलों के मूल्यांकन में पाया गया कि डायरिया से पीड़ित 2.9 फीसदी और निमोनिया से पीड़ित 2.7 फीसदी बच्चों से अधिक स्काई प्रदाताओं के पास नहीं गए। करीब 40 फीसदी अभिभावक बच्चों को स्थानीय अनौपचारिक स्वास्थ्य सेवा देने वाले लोगों के पास ले गए । दस्त से पीड़ित 37.7 फीसदी और निमोनिया से पीड़ित 42.7 फीसदी बच्चों को एमबीबीएस डॉक्टरों के पास ले जाया गया। अन्य जगहों से जो स्वास्थ्य सेवाएं ली गईं, उनमें दवाई की दुकानों में डायरिया के 12.2 फीसदी और निमोनिया के 8 फीसदी रोगी पहुंचे। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों तक डायरिया के 3.6 फीसदी और निमोनिया के 4.4 फीसदी रोगी पहुंचे।

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आयुष चिकित्सकों तक जिसमें आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी तक शीक हैं, दस्त के 3.3 फीसदी और निमोनिया के 1.9 फीसदी रोगी पहुंचे। सहायक नर्स, मिडवाइफ , सामाजिक मान्यता प्राप्त स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं , आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं तक दस्त के 0.2 फीसदी और निमोनिया के 0.2 फीसदी रोगी सहायता मांगने पहुंचे।

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बिहार

Source: Evaluation by researchers at Duke University, Stanford University and University College of London

मूल्यांकन में यह भी पाया गया कि कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों को मिली स्वास्थ्य सेवाओं से डायरिया या निमोनिया जैसी बीमारियों में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ।

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मोहनन कहते हैं, “ स्तरीय स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं के लिए हमें सख्ती से इस बात पर गौर करना होगा कि जरूरत कितनी है और स्वास्थ्य सेवा प्रदान करनेवाली इन सामाजिक इकाइयों की क्षमता क्या है? यहां यह भी देखना होगा कि क्या अच्छी सेवाओं के लिए रोगी इन एजेंसियों को भुगतान करने के लिए तैयार हैं।

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